Bhagavad Gita Chapter 12 Verse 10 — Bhakti Yoga

Sanskrit

अभ्यासेऽप्यसमर्थोऽसि मत्कर्मपरमो भव | मदर्थमपि कर्माणि कुर्वन्सिद्धिमवाप्स्यसि ||१२-१०||

Transliteration

abhyāse.apyasamartho.asi matkarmaparamo bhava . madarthamapi karmāṇi kurvansiddhimavāpsyasi ||12-10||

Hindi Meaning

।।12.10।। यदि तुम अभ्यास में भी असमर्थ हो तो मत्कर्म परायण बनो; इस प्रकार मेरे लिए कर्मों को करते हुए भी तुम सिद्धि को प्राप्त करोगे।।

English Meaning

If you cannot practice the regulations of bhakti-yoga, then just try to work for Me, because by working for Me you will come to the perfect stage.

Commentary

One who is not able even to practice the regulative principles of bhakti-yoga, under the guidance of a spiritual master, can still be drawn to this perfectional stage by working for the Supreme Lord. How to do this work has already been explained in the fifty-fifth verse of the Eleventh Chapter. One should be sympathetic to the propagation of Kṛṣṇa consciousness. There are many devotees who are engaged in the propagation of Kṛṣṇa consciousness, and they require help. So, even if one cannot directly practice the regulative principles of bhakti-yoga, he can try to help such work. Every endeavor requires land, capital, organization and labor. Just as in business one requires a place to stay, some capital to use, some labor and some organization to expand, so the same is required in the service of Kṛṣṇa. The only difference is that in materialism one works for sense gratification. The same work, however, can be performed for the satisfaction of Kṛṣṇa, and that is spiritual activity. If one has sufficient money, he can help in building an office or temple for propagating Kṛṣṇa consciousness. Or he can help with publications. There are various fields of activity, and one should be interested in such activities. If one cannot sacrifice the results of his activities, the same person can still sacrifice some percentage to propagate Kṛṣṇa consciousness. This voluntary service to the cause of Kṛṣṇa consciousness will help one to rise to a higher state of love for God, whereupon one becomes perfect.

Hinglish Commentary

Jo log bhakti-yoga ke niyam ko follow nahi kar sakte, phir bhi wo apne aap ko Bhagwan ke kaam mein laga kar is perfectional stage tak pahunch sakte hain. Yeh kaam kaise karna hai, yeh pehle se hi 11th Chapter ke 55th verse mein samjhaya gaya hai. Humein Kṛṣṇa consciousness ko failane mein madad karni chahiye. Bahut se bhakt is kaam mein lage hue hain aur unhe support ki zarurat hai. Agar aap directly bhakti-yoga ke niyam nahi bhi kar rahe hain, toh bhi aap unki madad kar sakte hain. Har kaam ke liye land, capital, organization aur labor ki zarurat hoti hai. Jaise business mein aapko ek jagah, kuch paisa, kaam karne wale log aur organization chahiye hota hai, waise hi Kṛṣṇa ki seva mein bhi yeh sab chahiye. Bas farq yeh hai ki materialism mein log apne sukh ke liye kaam karte hain, jabki wahi kaam agar Kṛṣṇa ki khushi ke liye kiya jaye toh yeh spiritual activity ban jaata hai. Agar kisi ke paas achha paisa hai, toh wo Kṛṣṇa consciousness ko failane ke liye office ya temple banane mein madad kar sakta hai, ya publications mein bhi help kar sakta hai. Bahut saare kaam hain, aur humein inmein dilchaspi rakhni chahiye. Agar koi apne kaam ka result sacrifice nahi kar sakta, toh wo thoda bahut percentage Kṛṣṇa consciousness ko failane ke liye zaroor sacrifice kar sakta hai. Yeh voluntary service Kṛṣṇa consciousness ke liye aapko Bhagwan ke liye pyaar ki ek unchi stithi tak le jaayegi, jahan aap perfect ban jaate hain.

Chinmaya Commentary

आत्मविकास के विविध और विस्तृत उपायों का वर्णन करने के कारण ही हिन्दू धर्मशास्त्रों में पूर्णता है। उसमें बतायी गई साधनाओं का मनोवैज्ञानिक दृष्टि से जो कोई पुरुष जितना ही अधिक अध्ययन करेगा वह उतना ही इस अध्यात्म मार्ग की उपादेयता को दृढ़ विश्वास के साथ स्वीकार करेगा। हमारे महान् धर्म ग्रन्थों में कहीं भी इस प्रकार की धमकी नहीं दी गई है कि इसे स्वीकार करो अन्यथा नरक में जाओ। जो कोई भी पुरुष बौद्धिक निश्चय और वैज्ञानिक मूल्यांकन के लिए तत्पर है वह हिन्दू जीवन पद्धति की श्रेष्ठता के प्रति पूर्णतया आश्वस्त हो जायेगा।यदि कोई साधक मानसिक दृष्टि से विक्षुब्ध और असंयमित है तो वह अभ्यासयोग का पालन करने में समर्थ नहीं हो सकता। यहाँ भगवान् श्रीकृष्ण का यह उपदेश है कि ऐसे साधकों को ध्यानाभ्यास में व्यर्थ संघर्ष नहीं करते रहना चाहिए। बलपूर्वक मन को शान्त करने के कारण वे मानसिक दमन और निग्रह के शिकार हो सकते हैं। मनुष्य का आन्तरिक व्यक्तित्व फूल की एक अनखिली कली की अपेक्षा लक्षगुना अधिक कोमल है। उसके खिलने में शीघ्रता करने का अर्थ है उसकी सुन्दरता और सुरभि का नाश करना। निदिध्यासन में हमारा प्रयत्न तो केवल ऐसे अनुकूल वातावरण को निर्मित करने के लिए है जिसमें हमारा आन्तरिक व्यक्तित्व शीघ्र किन्तु स्वत खिल उठे। स्वाभाविक है कि यदि कोई व्यक्ति एक प्रकार की साधना करने में असमर्थ है तो उसके विकास के लिए अन्य उपाय बताना आवश्यक होता है।यदि साधक का मन पूर्वाजित वासनाओं के कारण यदाकदा ही तुच्छ विषयों की ओर जाता है तो उसे संयमित करना कुछ सरल कार्य है। परन्तु यदि किसी पुरुष का मन इन विषयवासनाओं से पूर्ण है तथा अत्यन्त बहिर्मुखी है तो उसका ध्यानाभ्यास केवल ध्यानाभास ही होगा भगवान् कहते हैं कि ऐसे पुरुष को ध्यान छोड़कर कर्म करना चाहिये। परन्तु वे कर्म ईश्वर के लिए अर्पण की भावना से होने चाहिये। यही मत्कर्मपरमो भव वाक्य का अर्थ है। इस प्रकार के कर्मानुष्ठान से अत्यन्त बहिर्मुखी प्रवृत्ति के पुरुष को भी अपने समस्त दैनिक कर्मों में ईश्वर का अखण्ड स्मरण बना रह सकता है।सभी पिता अपने नवजात शिशु के प्रति इसी पद्धति को ग्रहण कर उसका पालन करते हैं। प्रत्येक पुत्र का जन्म पिता के लिये एक अपरिचित शिशु के रूप में ही होता है। परन्तु कुछ ही दिनों में उस पिता का अपने शिशु के प्रति प्रेम बढ़ता जाता है। व्यतीत होते हुये समय के साथ उस प्रेम का परिणाम इतना विशाल हो जाता है कि वह पिता शब्दश अपने पुत्र में ही जीता है। इसका कारण यह है पुत्र के जन्म के पश्चात् वह पिता जब कोई कर्म करता है या अनुभव प्राप्त करता है तो वे सब मन की पार्श्वभूमि में स्थित पुत्र की स्मृति से भयभीत होते रहते हैं और यही है पुत्र के प्रति अर्पण की भावना।योगेश्वर श्रीकृष्ण यहाँ सामान्य पुरुषों के लिए अत्यन्त व्यावहारिक उपाय का उपदेश देते हैं। उनका उपदेश हममें से अत्यधिक बहिर्मुखी पुरुष के लिए भी आशा का संदेश देने वाला है। बहुसंख्यक साधकों के लिए यह निश्चित ही राजमार्ग है। जिस प्रकार किसी व्यवसाय संस्था प्रतिष्ठान का प्रतिनिधि व्यवहार में कहता है कि हम वस्तु पूर्ति का प्रयत्न करेंगे हम इन वस्तुओं का निर्माण कर रहे हैं हम इसके लिए उत्तरदायी नहीं है इत्यादि। वह अपने प्रतिष्ठान के साथ तादात्म्य करके ऐसे व्यवहार करता है मानो वह प्रतिष्ठान का प्रबन्धकर्ता या संचालक हो जबकि वास्तव में वह एक प्रतिनिधि मात्र होता है। इसी प्रकार यदि हममें से कोई व्यक्ति निश्चयात्म्ाक रूप से स्वयं को ईश्वर का प्रतिनिधि मानकर ईश्वर के ही संकल्प को अपने कर्मों के द्वारा पूर्ण करने का प्रयत्न करे तो उसे सदैव ईश्वर का स्मरण बना रहेगा और वह स्वयं में कर्मकुशलता की अलौकिक शक्ति संगठनसार्मथ्य और आत्मविश्वासपूर्ण साहस को पायेगा।प्राचीन वैदिक विद्या के विद्यार्थी को जैसा कि अर्जुन था इस सरल से प्रतीत होने वाले उपदेश को सुनकर उसके वास्तविक प्रभाव के विषय में संदेह हो सकता है। रूढ़िवादी लोग किसी मौलिक विचार को सन्देह की दृष्टि से ही देखते हैं भले ही वह विचार उस युग के सबसे महान् जीवित पुरुष के द्वारा अथवा ईश्वर के अवतार के द्वारा ही क्यों न प्रतिपादित किया गया हो। इस कारण से यहाँ भगवान् श्रीकृष्ण साधकों को इस मार्ग के प्रभाव के प्रति आश्वस्त करते हुए कहते हैं कि मेरे लिए कर्म करते हुए भी तुम सिद्धि को प्राप्त होओगे।लोकव्यवहार में भी जब हम चाय बनाने के उद्देश्य से जल को उबलने के लिए रखते हैं तब किसी के प्रश्न करने पर हम यही कहते हैं कि मैं चाय बना रहा हूँ। वस्तुस्थिति की दृष्टि से यह कथन असत्य है परन्तु लक्ष्य की दृष्टि से पूर्ण सत्य है क्योंकि एक बार जल के उबल जाने पर चाय बनाने में न परिश्रम की आवश्यकता होती है और न अधिक समय की। इसी प्रकार ईश्वर को समस्त कर्म अर्पण करने की कला के द्वारा हम अपने दैनिक व्यावहारिक कर्म करते हुए भी मन में दैवी संस्कारों का विकास करते रहेंगे। इसा प्रक्रिया में हमारी पूर्वार्जित वासनाओं का क्षय़ भी होता रहेगा। इस प्रकार चित्त की शुद्धि प्राप्त हो जाने पर हम अभ्यासयोग के अधिकारी हो जायेंगे और शीघ्र ही पर्याप्त समता और सन्तुलन को प्राप्त कर सत्य आत्मा का ध्यान कर तत्स्वरूप बन जायेंगे।यदि कोई व्यक्ति इसे भी करने में असमर्थ हो तो उसके लिए भी उपाय अगले श्लोक में बताते हैं