Bhagavad Gita Chapter 18 Verse 44 — Moksha Sanyasa Yoga

Sanskrit

कृषिगौरक्ष्यवाणिज्यं वैश्यकर्म स्वभावजम् | परिचर्यात्मकं कर्म शूद्रस्यापि स्वभावजम् ||१८-४४||

Transliteration

kṛṣigaurakṣyavāṇijyaṃ vaiśyakarma svabhāvajam . paricaryātmakaṃ karma śūdrasyāpi svabhāvajam ||18-44||

Hindi Meaning

।।18.44।। कृषि, गौपालन तथा वाणिज्य - ये वैश्य के स्वाभाविक कर्म हैं, और शूद्र का स्वाभाविक कर्म है परिचर्या अर्थात् सेवा करना।।

English Meaning

Farming, cow protection and business are the natural work for the vaiśyas, and for the śūdras there are labor and service to others.

Commentary

There is no purport for this verse

Hinglish Commentary

Is verse ka koi vishesh arth nahi hai, lekin iska matlab samajhna zaroori hai. Yah verse humein yeh yaad dilata hai ki jeevan ke kuch pehlu aise hote hain jo seedha samjh nahi aate, lekin unka apna mahatva hota hai. Kabhi kabhi, humein bas is baat ko samajhna hota hai ki kuch cheezen bina kisi vyakhya ke bhi apni jagah par sahi hain. Isliye, is verse ko hum ek aise sandarbh ke roop mein le sakte hain jo humein dhyan dene aur samajhne ki prerna deta hai ki sab kuch hamesha vyakhya nahi hota, lekin uska apna ek maqsad hota hai.

Chinmaya Commentary

प्रत्येक मनुष्य में गुणों की तारतम्यता किसी विशिष्ट अनुपात में होती है और इसलिए प्रत्येक मनुष्य का अपना विशिष्ट स्वभाव भी होता है। इसी कारण एक मनुष्य जिस कार्य विशेष को कुशलतापूर्वक कर सकता है उसी कार्य को अन्य व्यक्ति उतनी कुशलता से नहीं कर पाता। रजोगुणी क्षत्रिय को सात्त्विक ब्राह्मण के समान ध्यानाभ्यास करना संभव नहीं होता। उसी प्रकार वैश्य और शूद्र भी क्षत्रिय के शूरवीरतापूर्ण कर्मों को नहीं कर पायेंगे। सामाजिक जीवन में सर्वोच्च प्रतिष्ठा के पद तक पहुँचने के लिए सभी मनुष्यों को पूर्णत एकरूप अवसर प्राप्त नहीं हो सकते। तथापि एक सामाजिक व्यवस्था सभी मनुष्यों को अपनेअपने स्वभाव के अनुसार विकसित हाेने के लिए तुल्य अवसर प्रदान कर सकती है। इस सिद्धांत या व्यवस्था को सफल बनाने हेतु विभिन्न व्यक्तित्व वर्णों के मनुष्यों के लिए भिन्नभिन्न कर्तव्यों का विधान किया गया है।वैश्य वृत्ति का पुरुष कृषि गौपालन तथा वाणिज्य के क्षेत्र में स्फूर्ति और प्रेरणा से कार्य करके अपने दोषों से मुक्त हो सकता है। दोषमुक्ति से तात्पर्य वासनाक्षय से है। वाणिज्यादि कर्मों में उसकी स्वाभाविक अभिरुचि होती है। उसी प्रकार अर्पण की भावना से सबकी सेवा करना शूद्र का स्वाभाविक कर्म है।प्रत्येक मनुष्य के आन्तरिक स्वभाव के अनुसार उसका वर्ण और कर्म निर्धारित किया जा सकता है। अपने स्वभाव के विपरीत कर्म में नियुक्त किये जाने पर मनुष्य न केवल उस कर्म क्षेत्र में दुर्व्यवस्था उत्पन्न करता है वरन् अपनी स्वयं की भी हानि कर लेता है। उदाहरणार्थ यदि किसी क्षत्रिय से कहा जाये कि वह सेवाभाव पूर्वक पंखा झलने का कार्य करे तो वह सम्भवत विनम्रता से उसे स्वीकार कर लेगा परन्तु तत्काल ही अपने स्वभाववश किसी दूसरे व्यक्ति को पंखा लाने की आज्ञा देगा इसी प्रकार यदि किसी वैश्य को मन्दिर का पुजारी बना दिया जाये तो वह पवित्र स्थान शीघ्र ही किसी व्यापारिक केन्द्र से भी निम्न स्तर का बन जायेगा और यदि उसके हाथों में राजसत्ता सौंप दी जाये तो वह अपने स्वभाव से विवश उस प्राप्त अधिकार द्वारा लाभदायक व्यापार करना प्रारम्भ कर देगा जनता इसे ही भ्रष्टाचार कहती है हम सबको आत्मनिरीक्षण के द्वारा अपना वर्ण और कर्म निर्धारित करना चाहिए। किसी भी उच्चवर्गीय पुरुष को निम्नवर्णीय मनुष्यों की ओर अनादर भाव से देखने का अधिकार नहीं है। प्रत्येक व्यक्ति यथाशक्ति समाज की सेवा करता है। ईश्वरार्पण की भावना से समाज की सेवा करते हुए प्रत्येक मनुष्य को आत्मविकास तथा पूर्णत्व प्राप्ति के लिए साधनारत रहना चाहिए।इसी विषय में भगवान् श्रीकृष्ण कहते हैं