Bhagavad Gita Chapter 18 Verse 69 — Moksha Sanyasa Yoga

Sanskrit

न च तस्मान्मनुष्येषु कश्चिन्मे प्रियकृत्तमः | भविता न च मे तस्मादन्यः प्रियतरो भुवि ||१८-६९||

Transliteration

na ca tasmānmanuṣyeṣu kaścinme priyakṛttamaḥ . bhavitā na ca me tasmādanyaḥ priyataro bhuvi ||18-69||

Hindi Meaning

।।18.69।। न तो उससे बढ़कर मेरा अतिशय प्रिय कार्य करने वाला मनुष्यों में कोई है और न उससे बढ़कर मेरा प्रिय इस पृथ्वी पर दूसरा कोई होगा।।

English Meaning

There is no servant in this world more dear to Me than he, nor will there ever be one more dear.

Commentary

There is no purport for this verse

Hinglish Commentary

Is verse ke liye koi vishesh vyakhya nahi hai, lekin iska matlab samajhna bhi zaroori hai. Yeh verse humein yeh sikhaata hai ki zindagi mein kabhi kabhi kuch cheezein seedhe samajh nahi aati, lekin humein unhe apne anubhav se samajhne ki koshish karni chahiye. Yeh ek tarah ka reminder hai ki sab kuch samajhne ke liye hamesha koi na koi gyaan ya anubhav chahiye hota hai. Isliye, jab hum kisi cheez ko nahi samajhte, toh humein apne andar ki khoj karni chahiye aur uss cheez ko samajhne ki koshish karni chahiye.

Chinmaya Commentary

यह भी आचार्य की स्तुति है। यहाँ भगवान् बताते हैं कि किस प्रकार ऐसा श्रेष्ठ आचार्य भगवत्स्वरूप को प्राप्त होता है। गीताचार्य भगवान् श्रीकृष्ण विशेष बल देकर कहते हैं उसके तुल्य इस जगत् में मेरा अतिशय प्रिय कार्य करने वाला और कोई नहीं है। केवल इतना ही नहीं अपितु भविष्य में भी उससे अधिक मेरा प्रिय इस पृथ्वी पर कोई न होगा।सम्पूर्ण गीता में अनेक स्थानों पर इस मनोवैज्ञानिक सत्य को दोहराया गया है कि ध्येयवस्तु से भिन्न समस्त वृत्तियों का परित्याग करके यदि कोई साधक अपने मन को ध्येयवस्तु में एकाग्र या समाहित कर लेता है तो वह स्वयं ध्येयस्वरूप बनकर अनन्त आत्मा का अनुभव कर सकता है। जो साधक गीता के अध्ययन और चिन्तनमनन में ही अपने समय का सदुपयोग करता है तथा उसी का प्रचार प्रसार करता है तो उसके मन में उस ज्ञान के प्रति अत्यधिक आदर और सम्मान जागृत होता है। फलत वह उसके सारतत्त्व से तादात्म्य करके परम शान्ति का अनुभव करता है जो परमात्मा का स्वरूप ही है। इसलिए भगवान् श्रीकृष्ण कहते हैं ऐसे पुरुष से बढ़कर मेरा कोई प्रिय नहीं है क्योंकि वह ईश्वर के स्वरूप के ज्ञान का प्रचार करता है। इससे अधिक मेरा अतिशय प्रिय कार्य कोई नहीं है।इस सन्दर्भ में यह ध्यान रहे कि गीताज्ञान के प्रचार के लिए हमें स्वयं उसमें पूर्ण प्रवीणता प्राप्त करने की प्रतीक्षा करने की आवश्यकता नहीं है। जो कुछ ज्ञान हम ग्रहण कर पाते हैं उसका तत्काल ही प्रेमपूर्वक प्रचार ऐसे लोगों में करना चाहिए जो इस विषय से सर्वथा अनभिज्ञ हैं। प्रचार के साथ ही हमें इस ज्ञान के अनुसार ही जीवन यापन करना चाहिए ऐसा पुरुष मुझे अतिशय प्रिय है। यह भगवान् श्रीकृष्ण का आश्वासन है।न केवल उपदेशक वरन् इस ज्ञान का निष्ठावान् जिज्ञासु विद्यार्थी भी अभिनन्दन का पात्र है। भगवान् कहते हैं