Bhagavad Gita Chapter 6 Verse 9 — Atma Samyama Yoga

Sanskrit

सुहृन्मित्रार्युदासीनमध्यस्थद्वेष्यबन्धुषु | साधुष्वपि च पापेषु समबुद्धिर्विशिष्यते ||६-९||

Transliteration

suhṛnmitrāryudāsīnamadhyasthadveṣyabandhuṣu . sādhuṣvapi ca pāpeṣu samabuddhirviśiṣyate ||6-9||

Hindi Meaning

।।6.9।। जो पुरुष सुहृद्, मित्र, शत्रु, उदासीन, मध्यस्थ, द्वेषी और बान्धवों में तथा धर्मात्माओं में और पापियों में भी समान भाव वाला है, वह श्रेष्ठ है।।

English Meaning

A person is considered still further advanced when he regards honest well-wishers, affectionate benefactors, the neutral, mediators, the envious, friends and enemies, the pious and the sinners all with an equal mind.

Commentary

There is no purport for this verse

Hinglish Commentary

Is verse ka koi vishesh arth nahi hai, lekin isse hum samajh sakte hain ki Bhagavad Gita mein har shabd ka apna maayne hota hai. Yeh verse humein yeh yaad dilata hai ki kabhi kabhi kuch cheezein aise hi hoti hain, bina kisi gehre samjh ke. Yeh bhi ek tarika hai humein sochne par majboor karne ka, ki hum apne jeevan mein kya seekh rahe hain aur kaise aage badh rahe hain. Har verse, chahe uska purport na ho, humein ek naya nazariya de sakta hai, bas humein usse samajhne ki koshish karni chahiye.

Chinmaya Commentary

पूर्व श्लोक में ज्ञानी पुरुष की जड़ वस्तुओं की ओर अवलोकन करने की दृष्टि का वर्णन किया गया है। परन्तु जगत् केवल जड़ वस्तुओं से ही नहीं बना है। उसमें चेतन प्राणी भी हैं। मानव मात्र के साथ ज्ञानी पुरुष किस भाव से रहेगा क्या उन्हें मिथ्या कहकर उनके अस्तित्व का निषेध कर देगा क्या जगत् के अधिष्ठान स्वरूप परमात्मा में स्थित होकर वह लोगों की सेवा के प्रति उदासीन रहेगा इन प्रश्नों का उत्तर इस श्लोक में दिया गया है।भगवान् श्रीकृष्ण कहते हैं कि ऐसा ज्ञानी पुरुष सभी मनुष्यों के साथ समान प्रेम भाव से रहता है चाहे वे सुहृद् हों या मित्र शत्रु उदासीन मध्यस्थ बन्धु साधु हों या पापी। अपनी विशाल सहृदयता में वह सबका आलिंगन करता है। प्रेम और आदरभाव से सबके साथ रहता है। उसकी दृष्टि में वे सभी समान महत्त्वपूर्ण हैं।उसका प्रेम साधु और पापी उत्कृष्ट और निकृष्ट में भेद नहीं करता। वह जानता है कि आत्मस्वरूप के अज्ञान से ही पुरुष पापकर्म में प्रवृत्त होता है और अपने ही कर्मों से दुख उठाता है। स्वामी रामतीर्थ इसे बड़ी सुन्दरता से व्यक्त करते हुये कहते हैं कि हम अपने पापों से दण्डित होते हैं न कि पापों के लिए।आत्मस्वरूप के अपरोक्ष अनुभव से वह यह पहचान लेता है कि एक ही आत्मा सर्वत्र व्याप्त है। अनेकता में एकता को वह जानता है औऱ विश्व के सामञ्जस्य को पहचानता है। सर्वत्र व्याप्त आत्मस्वरूप का अनुभव कर लेने पर वह किसके साथ प्रेम करेगा और किससे घृणा मनुष्य के शरीर के किसी भी अंग में पीड़ा होने पर सबकी ओर देखने का उसका भाव एक ही होता है क्योंकि सम्पूर्ण शरीर में ही वह स्वयं व्याप्त है।इस उत्तम फल को प्राप्त करने के लिए मनुष्य को क्या करना चाहिये उत्तर है